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Essay on waste side effects | कचरे के दुष्प्रभाव का निबंध | Waste store curse for humans

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Essay on waste side effects : यह धरती ही स्वर्ग की भाँति है। लेकिन ये मानव सभ्यता अपने लालच के लिए और अपनी आवश्यकता के अनुसार इस वातावरण का शोषण करती रहती है। जिस प्रकार पूरी धरती पर प्रदूषण का दर दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है, इससे यह साबित होता है कि समाज के प्रति यह इंसानों की शिक्षा-दीक्षा, सामाजिक व्यवहार, कानून व्यवस्था एक  अवस्थित और जर्जर समाज की रचना कर रही है। प्रदूषण पर सिर्फ किताबी ज्ञान के लिये कानून बनाया जाता  है, लेकिन कोई भी अपनी आदत बदलने को तैयार नहीं होता हैं।

हम एक ऐसे समाज का हिस्सा बनते जा रहे जहाँ लोग अपने वातावरण की चिंता के लिये बाह आडंबर का दिखावा करते हैं। स्वच्छता दिवस को मनाते तो है लेकिन उसे कोई मानता नहीं है।  सामाजिक सोच की प्रवृत्ति यह है की सामाजिक कार्यों तथा वातावरण से संबंधित कदम केवल सरकारी ही उठा सकती है, जो करना है सरकार करेगी। इंसान का अपने समाज और वातावरण के प्रति कर्तव्य होता है कि हम इसे हमेशा सुंदर और सुरक्षित बनाकर रखें। आज कचरे का भंडार पूरे विश्व में एक व्यापक समस्या है, जिसका निवारण करना बहुत ही आवश्यक है। एक तरह से कहा जाये तो वह अंतिम समय आ गया है जब हमें अपने पूरे मन और तन से अपने समाज को कचरा मुक्त बनाने की कोशिश करना चाहिए। ताकि हमने जो भारत को स्वच्छ और कचरा मुक्त बनाने का संकल्प लिया है उसे हम मिलकर पूरा करें।

          हम जहाँ भी रहते हैं वह भले शहर हो या गांव हो,लेकिन उसके आस पास जहाँ शहर और गांव खत्म होता है, वहाँ कचरे का ढ़ेर जरूर जमा होता है। यह कचरा कई कारणों से बनता है। जब कोई वस्तु उपयोग के लायक नहीं रहता है तब वह कचरे का रूप ले लेता है। कचरा कई रूपों में हो सकता है जैसे प्लास्टिक, ई-कॉमर्स कचरा, कोई टूट फूटा सामान जिससे समाज में कचरा फैलता है और वातावरण दूषित होता है। जहां ये बाद में नाले, नदी में जाकर जल प्रदूषित करते हैं तथा इसके जलावन से वायु प्रदूषित होती है।

 कचरा जमा होने के दो महत्वपूर्ण कारण है (Essay on waste side effects):-

  • प्लास्टिक का कचरा:- प्लास्टिक का अविष्कार एक वरदान की तरह माना जाता था लेकिन यह एक अभिशाप बन चुका है। जहां यह सामान को ले जाने के लिए आसानी होता है तो वहीं इसके कचरो से पूरी दुनिया की उम्र आधी हो रही है। वर्ल्ड फोरम इकोनामी की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में सालाना 56 लाख टन प्लास्टिक का कूड़ा बनता है। दुनिया भर में प्रति वर्ष जितना कूड़ा समुद्र में बहा दिया जाता है उसका 60% हिस्सा भारत का होता है। जिंदगी केवल इंसानों की नहीं होती है। समुद्र में जितना भी प्लास्टिक का कचरा फेंका जाता है उसका 99% कचड़ा समुद्री जीव जंतुओं के पेट में चला जाता है। इसके परिणाम स्वरूप प्रत्येक साल 10 लाख पक्षी एवं 1 लाख समुद्री स्तन पाई का जीवन प्लास्टिक  संबंधित पदार्थ खाने से जान गंवा बैठते हैं। प्लास्टिक का कचरा खाने से गाय भैंसों के जीवन का खतरा भी बढ़ गया है। प्लास्टिक के जो मुख्य पदार्थ होते हैं जैसे प्लास्टिक के बोतल, कप, प्लेट, छोटे बोतल, प्लास्टिक के स्ट्रो और कुछ टाइप की पैकिंग प्लास्टिक जब कचरो का रूप ले लेते है तब यह मिट्टी में मिल जाते हैं जिसके कारण मिट्टी भी काफी अधिक प्रदूषित हो जाती है।

              प्लास्टिक कुल 40 देशों में प्रतिबंध है। अफ्रीका की केन्या नामक देश में प्लास्टिक पूर्ण रूप से प्रतिबंध कर दिया गया है तथा वहां पर इसका कठोर दंड भी रखा गया हैं। इसके साथ प्लास्टिक पूर्ण रूप से फ्रांस, इटली, चीन, भारत और अन्य कई देशों में प्लास्टिक पूर्ण रूप से प्रतिबंध है। भारत मैं प्लास्टिक प्रतिबंध की स्थिति बिल्कुल लचीला है, जिसके कारण प्लास्टिक आज भी खुलेआम बाजार में बिकता है।

  1. ई-कॉमर्स कचरा:- ई वेस्ट कचरा एक आधुनिक समाज का कुड़ा है जहां पर यह समाज के विकास के साथ-साथ, उसके दुष्परिणाम को  दर्शाता है। इस तकनीकी जिंदगी में लोगों की बढ़ती मांग के अनुसार नए-नए इलेक्ट्रॉनिक गैजेट जब पुराने हो जाते हैं तो उनको कबाड़ के रूप में फेंक दिया जाता है जिससे ई कचरा बनता है। जिस प्रकार समय बदलता रहता है उसी तरह लोगों की तकनीकी जिंदगी भी काफी हद तक बदल जाती है। जैसे पहले कंप्यूटर के जो बड़े-बड़े डबों का इस्तेमाल होता था वहां अभी स्लिम और मॉनिटर का इस्तेमाल होता है जिनके पार्ट्स में मॉनिटर, माउस और सीपीयू इन सभी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट एक तरह से ई-कॉमर्स कचरे का रूप ले लेते हैं। इसी तरह से पुराने टीवी, फ्रीज, वाशिंग मशीन, मोबाइल फोन, टैब, लैपटॉप, जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान जब कोई काम का नहीं रहता तब वह कचरे  में परिवर्तित हो जाता है जिससे काफी अधिक मात्रा में ई-कॉमर्स कचरा तैयार होता है। जिसके कारण ई-कॉमर्स कचरा वातावरण को प्रदूषित करने में काफी सहायक है। इससे मनुष्य के स्वास्थ्य पर काफी अधिक प्रभाव करता है क्योंकि इन कचरों से होकर जब बारिश का पानी नदी नालों में मिलता है तो जल में मिले रसायन के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर काफी बुरा असर पड़ता है।

               अभी वर्तमान समय में किसी भी देश के पास इकॉमर्स कचरा से बचने के लिए कोई उच्च तकनीकी का साधन नहीं है। पूरी दुनिया में जितना ई-कॉमर्स कचरा तैयार होता है उसका 80% हिस्सा बड़े-बड़े देश जैसे अमेरिका, जापान, कोरिया का सारा कचरा दक्षिण एशियाई देशों जैसे भारत, पाकिस्तान, चीन और म्यांमार में ग्राउंड डाम्बिंग किया जाता है। यह हमारे आने वाले भविष्य के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकता है। इसके पार्ट्स को जलाने पर इन पर लगे मेटल्स को निकाल दिया जाता है और उनसे काफी अधिक जहरीला धुंआ निकलता है जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए काफी हद तक घातक होता है।

 अधिक कचरा जमा होने से कई तरह का प्रदूषण होता है जो निम्नलिखित है (Essay on waste side effects):-

1.जल प्रदूषण के दुष्परिणाम:

 जल हमारे मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है जिसका स्वच्छ होना अत्यंत आवश्यक है। जल में प्रवाहित किए जाने वाले कीटनाशक दवाओं, अवशिष्ट पदार्थों तथा प्लास्टिक के कचरे के कारण जल प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है जो अत्यंत प्राण घातक होता है।

2.वायु प्रदूषण के दुष्परिणाम:

वायु पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो जीव धारियों के जीवन के लिए अत्यावश्यक है। वायुमंडल में आक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड आदि गैसों की निश्चित अनुपात में उपस्थिति धीरे-धीरे असंतुलित होती जा रही है। जब प्लास्टिक और रासायनिक कचरे जलते हैं तो काफी मात्रा जहरीले तत्व निकलते हैं जिसका परिणाम घातक हो सकता है।

3.मिट्टी प्रदूषण के दुष्परिणाम:

कीटनाशक पदार्थों अथवा अवशिष्ट पदार्थों के अत्याधिक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति का नाश होना मिट्टी प्रदूषण कहलाता है। कृषि में प्रयोग किए जाने वाले मैथीलियान, गेमैक्सीन, डाइथेन एम 45, डाइथेन जेंड 78, पॉलिथीन अथवा प्लास्टिक आदि के प्रयोग से मिट्टी प्रदूषण की गंभीर समस्या सामने आती है। मिट्टी प्रदूषण के दुष्परिणाम अत्यंत भयावह हो सकते हैं। मिट्टी में मिले हुए पॉलिथीन भोजन के साथ-साथ पशुओं के स्वांस नली तक जाकर अटक जाते हैं जिससे उनकी मृत्यु तक हो जाती है।

कचरे अथवा अपशिष्ट पदार्थों के दुष्परिणाम से बचने के लिए किए जाने वाले निवारण:

अवशिष्ट पदार्थों के दुष्परिणाम के फलस्वरूप कई प्रकार के ऐसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं जो मानव समाज के लिए अत्यंत भयावह सिद्ध होती हैं। मनुष्य को प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होता है परंतु इसके असंतुलित होने से प्रदूषण की समस्या सामने आती है।

ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में अलग-अलग विधि से विभिन्न प्रकार के कचरा निष्पादन प्रक्रिया द्वारा अपशिष्ट पदार्थों का निवारण किया जाता है जो निम्नलिखित हैं- 

ग्रामीण क्षेत्रों में कचरा निवारण प्रक्रिया:

ग्रामीण क्षेत्रों में नगर पालिकाओं की सुविधा उपलब्ध नहीं होती है जिसके कारण अपशिष्ट पदार्थों का निष्पादन छोटे स्तर पर किया जाता है। इसके लिए जो  तरीके अपनाए जाते हैं वे निम्नलिखित है-

  1. कंपोस्टिंग:- ग्रामीण क्षेत्रों में कचरे की निष्पादन के लिए कंपोस्टिंग विधि बेहद लाभकारी होती है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें घास, पत्ते, गोबर आदि का प्रयोग खाद बनाने में किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में गड्ढे खोदकर इन सभी अपशिष्ट पदार्थों को उस में डाल कर खाद बनने के लिए छोड़ दिया जाता है। 6 महीने के अंदर इन पदार्थों से खाद तैयार हो जाती है एवं गड्ढे से खाद निकाल कर वापस गड्ढे को मिट्टी से ढक दी जाती है। इससे अपशिष्ट पदार्थों का प्रयोग खेती में किया जाता है जो अत्यंत लाभकारी होती है।
  2. 2. वर्मी कल्चर:- यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें लकड़ी के किसी बक्से या मिट्टी के गड्ढे में एक परत जैविक विघटन कचरे की परत बिछाई जाती है एवं इसके ऊपर केंचुए को छोड़ दिया जाता है। इसके ऊपर कचरा डालकर पानी का छिड़काव कर दिया जाता है जो कुछ समय में ही अच्छी खाद बन जाती है।

शहरी क्षेत्रों में कचरा निवारण प्रक्रिया:

शहरी क्षेत्रों में कचरे के निवारण के लिए कई प्रकार की उचित व्यवस्था है जैसे नगर पालिका आदि होती है। इसके अलावा शहरों में कई प्रकार के ऐसे पद्धतियों का आविष्कार किया गया है, जिससे कचरा निवारण आसानी से किया जा सकता है जो निम्नलिखित है-

  1. कागज बनाना: शहरों में औद्योगिक प्रक्रियाओं की सहायता से कई सारे ऐसे मशीनों का आविष्कार किया गया है जिसमें पुराने अथवा फटे कागजों द्वारा नए कागज बनाए जाते हैं।
  2. सड़क निर्माण करना: देश भर में सड़क निर्माण की पहली बार प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल करना बेहद आश्चर्यजनक एवं उपयोगी है। 30 नवंबर 2011 को सर्वप्रथम साकची बाग जमशेद स्कूल से जुबली पार्क के मुख्य द्वार तक जो सड़क बनाई गई थी उसमें सबसे अधिक प्लास्टिक के कचरे का इस्तेमाल किया गया था।  कचरों का सदुपयोग कर बनाई जाने वाली सड़कें काफी मजबूत होती है जिसमें जलभराव के प्रति रजिस्टेंस भी बढ़ता है। इससे पेंटिंग कॉस्ट में भी कमी आती है।

निष्कर्ष:- कचरे की समस्या दिन पर दिन काफी अधिक बढ़ती जा रही है। इसका सही समय पर निवारण किया जाना बहुत ही आवश्यक है। हमें मिल कर प्रण लेना होगा कि हम जिस समाज में रहते हैं वहाँ वातावरण को सुरक्षित रखने के लिए प्रदूषण नहीं फैलाएंगे। प्रदूषण मुक्त तब ही संभव हो सकेगा जब हम अपनी आदत डालेंगे की जितना अधिक हो सके सिंगल यूज़ प्लास्टिक और उनसे बाने सामानों का इस्तेमाल न करें। इनके अलावा  जैविक  पदार्थों का इस्तेमाल करें।

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