Essay on the concept of chitta in Hindi | हिंदी में चित्त की अवधारणा पर निबंध

essay on the concept of chitta in hindi

Essay on the concept of chitta in Hindi: चित्त हमारे अंदर की वह प्रवृत्ति है, जिसे मन का अगला आयाम कह कर संबोधित किया जाता है। चित्त का अर्थ चेतना है, जो स्मृतियों से पूरी तरह अलग एवं भिन्न है। चित्त का मुख्य अर्थ है चेतना। इसके अन्य प्रमुख स्वरूपों को जानकारी, मान्यता एवं भावना की संज्ञा दी गई है। मानव के अंतः करण के रूप में यदि इसे देखा जाए तो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के रूप में हम इसे देख सकते हैं।

चित्त हमारे मन की एक ऐसी मनोस्थिति है, जिसके एकाग्र रहने पर चित्त की वृत्तियां स्वयं कार्य करती है। यह एक ऐसा योग है जिसमें चित्त की एकाग्रता को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। चित्त का संबंध योग से विशेष रूप से जोड़ा जाता है। योग के माध्यम से योगी से यह आशा की जाती है कि वह एक ऐसा चमत्कार करें अथवा अपने योग से कुछ ऐसी कलाकारी पेश करें जिसके बलबूते पर वह अपने विलक्षणता को भी प्रमाणित कर सके। 

चित्तवृत्ति एक ऐसा योग है जिसमें अनुशासन को विशेष महत्व दीया जाता है जाता है। इसके अतिरिक्त चित्त वृत्तियों के निरोध का योगानुशासन करने से मस्तिष्क में बिखराव रुक जाता है एवं इसके साथ-साथ अनौचित्य अपनाने पर अंकुश भी लगता है जो हमारे अंतःकरण, मस्तिष्क एवं हमारे स्वास्थ्य लिए उपयुक्त होती है। चित्त किसी वस्तु का वह व्यक्तिगत अनुभव है जो प्रति पल परिवर्तित होती रहती है। विभिन्न भाषाओं में मन के विषय में विभिन्न प्रकार की धारणाएं, अनुभव एवं विचार व्यक्त किए गए हैं। बौद्ध धर्म के मतानुसार मन के लिए संस्कृत के चित्त शब्द का विशेष प्रयोग किया गया है, जिसका प्रयोग अत्यंत व्यापक रूप से किया जाता है।

चित्त की वृत्तियां :

चित्त की प्रमुख पांच वृत्तियां है, जिसे निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम (role of internet education) से देखा जा सकता है-

  1. प्रमाण अर्थात प्रत्यक्ष अनुमान एवं आगम। 
  2. मिथ्या ज्ञान अर्थात विपर्यय।
  3. वस्तु शून्य कल्पित नाम अर्थात विकल्प।
  4. दृष्ट पदार्थ का स्मरण चित्त में आना एवं स्मृति।
  5. निद्रा

चित्त की वृत्तियां मुख्य रूप से संस्कृत का शब्द है जिसका पूर्ण अनुवाद करना संभव नहीं है। परंतु इसके बावजूद देखा जाए तो सुविधा के लिए हम कह सकते हैं कि इसका संबंध अमूर्त मनोभाव और तिथियों से है जो किसी इंसान के पांचों इंद्रियों द्वारा अपने परिवेश से ग्रहण की जाती है। अंग्रेजी में इसे हम Cyclic Attitudinal Aggregation कह सकते हैं। चित्त की वृत्तियों का वर्णन हमारे समृद्ध एवं प्राचीन भारतीय मूल चिंतन में की गई है। इसके अतिरिक्त भारतीय दर्शन में भी इसकी चर्चा है, जिसका मुख्य रूप से उल्लेख किया गया है।

चित्त की संबंध में पतंजलि का मानना है कि चित्त की वृत्तियों को चंचल होने से रोकना वास्तविक रुप से योग कहलाता है। इसके अतिरिक्त अपने मन को अधिक भटकने एवं अस्थिर रखने की प्रक्रिया को इसके विपरीत रखना योग का ही दूसरा रूप है। योग की दृष्टि से चित्त का विशेष योगदान है , जो योग के माध्यम से अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पतंजलि के कथन अनुसार तीन प्रमुख चित्त भूमि अर्थात क्षिप्त, विक्षिप्त एवं मूढ़ ऐसी चित्त भूमियां है, जिनमें योग भी नहीं किया जा सकता। योग की प्रक्रिया केवल अंतिम दो चित्त भूमि अर्थात निरूद्ध एवं एकाग्र में ही संभव है। 

चित्त को एकाग्रता के अंतर्गत सम्मिलित करने में इनके बीच संबंध: 

योग की दृष्टि से चित्त एवं एकाग्रता का विशेष संबंध है। इसके लिए 8 ऐसे अंगो का विधान किया गया है जिसका वर्णन योग दर्शन में किया जाता है। इन आठ विधानों को निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है- 

  1. यम  
  2. नियम  
  3. प्राणायाम  
  4. आसन   
  5. ध्यान  
  6. प्रत्याहार   
  7. धारणा  
  8. समाधि 

चित्त के इन 8 विधान को कई प्रकार के स्वतंत्र ग्रंथों में भी व्याख्या एवं प्रेरणा के साथ उदाहरण के माध्यम से व्यक्त किया गया है। इसमें मुख्य रूप से आसन, प्राणायाम एवं समाधि सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त अन्य विधानों का भी अलग-अलग स्थानों पर अपना विशेष महत्व है। चित्त के आठ विधानों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से उजागर किया जा सकता है –

  1. यम : योग दर्शन से संबंधित आठ अंगों में यम का एक महत्वपूर्ण चित्त  योग है। इसके अंतर्गत चारों ओर शांति का वातावरण तैयार किया जाता है। यम के पांच प्रमुख भाग अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेयं एवं अपरिग्रह है। मन, कर्म एवं वचन तीनों से किसी भी प्राणी को कोई कष्ट ना देना अथवा हिंसा ना करना ही अहिंसा कहलाता है। इन्हीं तीनों से सत्य की स्थापना करना सत्य के स्थान पर प्रतिष्ठित होता है। अपरिग्रह के रूप में धन को संग रखना एवं खोए जाने पर दुख व्यक्त इतना करना अपरिग्रह की श्रेणी में आता है।
  2. नियम : अपने कर्म फल में दुखी ना होकर स्वाभाविक रहने के लिए मुख्यता स्वच्छ (waste side effects), संतोष, स्वाध्याय आदि के विषय में जानना एवं उसका पालन करना नियम के अंतर्गत आते हैं। 
  3. प्राणायाम : प्राणायाम एक ऐसी विधि है जिसमें मानव चित्त के अंधकार में वातावरण अथवा आवरण को हटाकर ज्ञान के प्रकाश से उज्जवल करने की चेष्टा की जाती है।
  4. आसन : चित्त को एकाग्र रखने के लिए आसन का विशेष महत्व है। शांति एवं सुखपूर्वक बैठने की प्रक्रिया आसन कहलाती है। इससे चित्त के शांत भाव की अनुभूति होती है।
  5. ध्यान : ध्यान अपने चित्त को एकाग्र करने की एक ऐसी विधि अथवा प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य अपने एक ही लक्ष्य पर अपना ध्यान केंद्रित रखता है तथा निरंतर उसी लक्ष्य के लिए संघर्ष करता है। इससे उसका चित्त एक ही स्थान पर केंद्रित और ध्यानमग्न रहता है।
  6. प्रत्याहार : जब इंद्रियां अपने विषयों से अलग हो जाती हैं तो वह प्रत्याहार के अंतर्गत आती है। प्रत्याहार योग से संबंधित एक ऐसी विधि है जिसमें योगी अपने इच्छा अनुसार अपनी आत्मा को शरीर से अलग कर सकता है। इसके अतिरिक्त उसे निकालकर हाथ में रखी किसी वस्तु की तरह पुनः ग्रहण कर सकता है।
  7. धारणा : चित्त को किसी एक विशेष स्थान पर केंद्रित करने के फलस्वरुप जब मन पूर्ण रूप से एकीकृत हो जाता है तब इस प्रक्रिया को धारणा की श्रेणी में रखा गया है। इसके अंतर्गत 21 मिनट 26 सेकंड तक बिना स्वास लिए व्यक्ति को रहना पड़ता है।
  8. समाधि : चित्त को एकाग्र करने का सबसे भीतरी माध्यम समाधि में प्रवेश करना है। जब कोई ध्याता अपने ध्यान में मग्न रहता है, तब उसे केवल एक ध्येय मात्र का प्रकाश ही नजर आता है। ध्याता ऐसे समय में 10 के सामान प्रतीत होने लगता है जिसे समाधि की अवस्था कहते हैं।

चित्त की प्रमुख अवस्थाएं:

की वित्तियों को महत्वपूर्ण माना गया है। पतंजलि ने चित्त के पास प्रमुख वित्तीय के रूप में क्षिप्त, विक्षिप्त, निरुद्ध, मूढ़ एवं एकाग्र को प्रमुख स्थान दिया है। इसे चित्तभूमि के नाम से भी जाना जाता है। 

मुनि व्यास द्वारा भी चित्त के विषय में पांच प्रमुख अवस्थाएं बताई गई है जिसे निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है-

१. मूल अवस्था: चित्त की यह अवस्था पूर्ण रूप से तम प्रधान होती हैं, जिसमें काम, क्रोध, लोभ तथा मोह का वास होता है। इस अवस्था में मनुष्य पूर्ण रूप से अंधकार में रहता है जिसके कारण वह समाधिस्थ नहीं हो पाता।

२. विक्षिप्त अवस्था: इस अवस्था में मनुष्य का चित्त पूर्ण रूप से सद्गुण प्रधान माना जाता है। इस अवस्था में वैराग्य और ऐश्वर्य भी उपस्थित होता है। यह एक महत्वपूर्ण योगों में से एक है।

३. निरूद्धावस्था: जब बुद्धि और प्रसिद्धि के साथ चित्त एवं पुरुष का भेद (Sky is blue)सामने प्रकट होता है तब उस ख्याति से वैराग्य पूर्ण रूप से उदस माना जाता है। 

४. एकाग्रावस्था: मनुष्य का चित्र इस अवस्था में सत्व गुण प्रधान होता है, जिसमें राज्य के साथ-साथ तम गुण भी मिले होते हैं।

५. क्षिप्त अवस्था: मनुष्य का चित इस अवस्था में राज्य प्रधान होता है एवं यही कारण है कि क्रोध, मोह एवं रज जैसे सभी सांसारिक कर्मों की प्रवृत्ति मनुष्य के मन में पाई जाती है।

चित्त की एकाग्रता के कारण ही चित्त की वृत्तियां अपना कार्य करती हैं। इसके अतिरिक्त आत्मा की बहिर्मुखी वृत्ति में इसके कार्य की प्रक्रिया चलती रहती है।