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Essay on Jagdish Chandra Bose in Hindi | हिंदी में जगदीश चंद्र बोस पर निबंध

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Essay on Jagdish Chandra Bose in Hindi: भारत मे कई महान वैज्ञानिकों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने काम के द्वारा देश का गौरव बढ़ाया है। ऐसे ही एक वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस है, जिन्होंने पूरी दुनियाँ को यह बताया कि पेड़ों में भी जीवन होता है।

जगदीश चंद्र बोस पर निबंध (Essay on Jagdish Chandra Bose) में आपको इनके जीवन के कई अलग अलग पहलुओं के बारे में जानने को मिलेगा।

जगदीश चंद्र बोस पर निबंध कई बार अलग अलग कक्षाओं की परीक्षा में भी पूछा जाता है। इसलिए इस निबंध को बहुत सरल भाषा मे लिखा गया है, ताकि इसे समझने और याद करने में कोई दिक्कत न हो।

प्रस्तावना

सर जगदीश चंद्र बोस भारत के पहले प्रसिद्ध वैज्ञानिक है जिन्होंने प्रयोग के माध्यम से यह सिद्ध किया कि पेड़ों में भी जान होती है।

पेड़ भी ठंडी, गर्मी और आवाज को महसूस कर सकते हैं। जगदीश चंद्र बोस ने बताया कि पेड़ों और जानवरों में कुछ ज्यादा फर्क नही है।

पेड़ों को भी जानवरों और इंसानों की तरह ही तब दर्द महसूस होता है जब उन्हें काटा जाता है। पेड़-पौधों के ऊपर इन्होंने पूरी रिसर्च की, इसी वजह सर जगदीश चंद्र बोस को जीवभौतिकी का जनक कहा जाता है।

इन्होंने ने ही अपने काम के जरिए विज्ञान की एक नई शाखा, जीवभौतिकी को जन्म दिया, जो आगे चलकर विज्ञान की एक बड़ी ब्रांच बनकर उभरी।

इनका योगदान न सिर्फ जीवभौतिकी के क्षेत्र में है बल्कि भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में भी इन्होंने काफी काम किया है।

जगदीश चंद्र बोस की सोच काफी प्रखर थी। इसी वजह से कहा जाता है कि ये अपने वक़्त से 60 वर्ष आगे थे।

Table of Contents

जगदीश चंद्र बोस का प्रारंभिक जीवन (Life of Jagdish Chandra Bose)

सर जगदीश चंद्र बोस का जन्म 30, नवम्बर 1858 को बंगाल के मुंशीगंज जिले में हुआ था। यह जिला अब बांग्लादेश के हिस्सा है। इनकी माता का नाम बामा सुंदरी बोस और पिता का नाम भगवान चंद्र बोस था। इनके परिवार की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी थी।

इनके पिता ब्रिटिश सरकार के आधीन काम करते थे। ये फरीदपुर जिले के डिप्टी मजिस्ट्रेट थे। इनकी माता गृहणी थी। इनका बचपन फरीदपुर में ही बीता है।

जगदीश चंद्र बोस की शिक्षा (Education of Jagdish Chandra Bose)

जगदीश चंद्र बोस की स्कूली शिक्षा वर्नाक्यूलर स्कूल में शुरू हुई थी, इसके बाद St. Xavier’s School & College कोलकाता में भर्ती लिया।

इन्होंने 1875 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा पास किया, जिसके बाद इन्होंने B.Sc कोर्स यही से किया। 1879 में फिजिक्स विषय से बीएससी की डिग्री भी पूरी हो गई।

इसके बाद और अधिक पढ़ाई करने के लिए इन्होंने लंदन को चुना। 1882 में लंदन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में बीएससी के लिए फिर प्रवेश लिया।

1884 में उनकी फिजिक्स विषय पर ही बीएससी की डिग्री पूरी हो गई जिसके बाद वो भारत वापस आ गए।

भारत मे आते ही इन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता में फिजिकल साइंस विषय पर प्रोफ़ेसर बनने का प्रस्ताव मिला, जिसे इन्होंने खुशी के साथ स्वीकार्य कर लिया।

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रवेश की कहानी (Jagdish Chandra Bose Admission of Cabridge University)

जगदीश चंद्र बोस ने अपने कैरियर की शुरुआत एक प्रोफेसर के तौर पर शुरू की, लेकिन यह उनका पहला लक्ष्य नही था।

कोलकाता यूनिवर्सिटी से बीएससी की डिग्री हासिल करने के बाद बोस इंग्लैंड जाकर इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा देना चाहते थे। लेकिन इनके पिता यह नही चाहते थे।

उनकी सोच थी कि जगदीश चंद्र किसी की गुलामी न करें और खुद स्वतंत्र रहकर कोई काम करें। इसीलिए बोस को यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन, मेडिसिन की पढ़ाई के लिए भेज दिया गया।

लेकिन यहां का माहौल बोस को अच्छा नही लगा। खासकर यहाँ की गंध बहुत परेशान करती थी, जिस वजह से बोस बीमार पड़ने लगे और उन्होंने ये यूनिवर्सिटी ही छोड़ दी।

लेकिन तभी आनंदमोहन दास ने इनकी बहुत मदद की। आनंदमोहन दास इनके जीजा थे, जिन्होंने क्राइस्ट कॉलेज से पहले ही डिग्री पा ली थी।
क्राइस्ट कॉलेज, कैंब्रिज कॉलेज का ही हिस्सा है। वो इस कॉलेज में एक स्कॉलर थे। इस वजह से इन्होंने जगदीश चंद्र बोस का एडमिशन यहां करवाने की शिफारिश की।

इनकी सिफारिश से बोस को यहां एडमिशन मिल गया। इस कॉलेज में प्रवेश मिलने के बाद बोस के जीवन में कई बड़े बदलाव आए। यहाँ इन्हें फ्रांसिस डार्विन, James Dewar, Francis Balfour, Lord Rayleigh जैसे कई विद्वान प्रोफेसर मिले।

यही पर इनकी मुलाकात प्रफ्फुल चंद्र रॉय से हुई, जो कि आगे चलकर एक बड़े वैज्ञानिक बने। जगदीश चंद्र बोस सबसे ज्यादा सिस्टर निवेदिता से प्रभावित थे।

सिस्टर निवेदिता बोस के काम के लिए पैसे जुटाती थी। साथ ही किसी रिसर्च पेपर को एडिट करने में बहुत मदद करती थी। वो चाहती थी कि बोस के काम मे किसी भी तरह की रुकावट उत्पन्न न हो।

Jagdish Chandra Bose researches on irritability of plants

सन 1913 में जगदीश चंद्र बोस ने एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें उन्होंने बताया कि पेड़ों के द्वारा भी प्रतिक्रिया दी जाती है।

इसी रिसर्च को irritability concept of plants भी कहा जाता है। इस रिसर्च का विचार इन्हें तब आया था जब बोस फ्रांसिस ग्लीसन और अल्ब्रेच हॉलर के साथ काम करते थे।

हॉलर ने जानवरों के ऊपर प्रयोग के माध्यम से यह बताया था कि Sensibility और Irritability में फर्क होता है।

किसी भी चीज़ को महसूस करने की क्षमता Sensibility कहलाती है, जबकि महसूस करने के बाद प्रतिक्रिया करना Irritability कहलाता है।

19 वी सदी के अंत तक Irritability से संबंधित सभी प्रयोग सिर्फ जानवरों के ऊपर ही हुए थे। लेकिन बोस जैसे दूरदृष्टि रखने वाले वैज्ञानिक ने पहली बार पेड़ों के ऊपर यह प्रयोग करने का फैसला किया।

यह प्रयोग करने के लिए बोस ने एक छोटा सा पौधा लिया जिसकी जड़ को एक जार में डुबा दिया। इस जार में ब्रोमाइड सॉल्यूशन भरा हुआ था। ब्रोमाइड सॉल्यूशन एक तरह का जहर है जो किसी को मार सकता है।

बोस ने पौधों की पल्स से जोड़ने वाला एक खास यंत्र खुद ही बनाया था। इस यंत्र को उन्होंने पौधे से जोड़ दिया।

इस यंत्र में एक छोटी सी लाइट लगी हुई थी जो पौधे की गति के अनुसार जलती और बुझती थी। सभी की नजर उस लाइट पर ही थी। तभी अचानक से वह लाइट काफी जल्दी जल्दी हरकत करने लगी।

इसकी हरकत तेज होने का मतलब था कि पेड़ के अंदर ही हलचल काफी तेज हो गई है। कुछ देर इसी तरह होने के बाद अचानक वह लाइट बंद हो जाती है, जो इस बात का इशारा था कि पौधे के अंदर की हलचल बंद हो चुकी है।

पौधे की हलचल ठीक उसी तरह थी जैसे जहर खाने के बाद चूहा तड़पता है। इस प्रयोग के बाद यह सिद्ध हो गया था कि पेड़ भी किसी क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया करते हैं।

Jagdish Chandra bose Researches and Inventions.

जगदीश चंद्र बोस ने कई अलग अलग क्षेत्रों में काम किया है लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान पेड़ों के जीवन को लेकर रहा है।

इनका हमेशा से ही मानना रहा है कि पेड़ों के जीवन और जानवरों में जीवन मे काफी समानताएं होती है। साथ ही सभी निर्जीव और सजीव चीज़े किसी न किसी एक बिंदु पर जरूर एक जैसी हो जाती होगी।

अपनी इन्ही सोच के आधार पर कई अलग अलग तरह खोजें जगदीश चंद्र बोस ने की। इनके जीवन की कुछ प्रमुख खोजें निम्नलिखित है:-

प्रकाश संश्लेषण और मौसम के बीच संबंध (Relationship between photosynthesis and weather)

अपनी रिसर्च के दौरान बोस ने मौसम और Photosynthesis के बीच एक अनोखा संबंध खोजा। Photosynthesis पेड़ों में वाली एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमे CO2 और H2O पेड़ों के द्वारा ग्रहण किया जाता है।

इनकी मदद से कार्बोहाइड्रेट बनता है और ऑक्सीजन को वातावरण में छोड़ दिया जाता है। बोस ने अपनी किताब ‘The Physiology of Photosynthesis’ में इस बात का जिक्र किया है कि Hydrilla में Photosynthesis की प्रक्रिया गर्मी और ठंडी में अलग अलग होती है।

गर्मी के मौसम में Photosynthesis की दर बढ़ जाती है जबकि सर्दी के मौसम में यह कम रहती है। साथ ही इस इस बात का भी जिक्र किया कि गर्मी के मौसम Hydrilla में Acid बढ़ जाता है, जबकि ठंडी और बारिश में यह कम रहता है।

पेड़ों में भी तंत्रिका तंत्र(Nervous System) होता है।

जगदीश चंद्र बोस पेड़ों पर रिसर्च करने के लिए कई तरह से मशीनें बनाते रहते थे। इनमे कुछ तो इनके नाम पेटेंट ही नही है। ऐसी ही एक मशीन थी
Microelectrode recording system.

इस मशीन की मदद से बोस पेड़ों के विद्युतीय प्रतिकिया को जांचते थे। इन्होंने पेड़ के हर सेल की Electronic प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। तब जाकर काफी वर्ष बाद यह निष्कर्ष दिया कि पेड़ों का भी Nervous System होता है। यह भी उसी तरह काम करता है जैसे जानवरों का करता है।

रेडियो तरंगें (Radio Waves) पर महत्वपूर्ण खोज.

1894 नवम्बर में जगदीश चंद्र बोस ने कोलकाता में सबसे सामने रेडियो वेव का उपयोग दिखाया था। इसके लिए उन्होंने गन पाउडर लिया और उसे जलाया।

फिर इसकी मदद से कुछ दूर रखी घंटी को बजाया। इस प्रयोग के जरिए बोस ने सबको बताया कि Signal को भेजने के लिए तार की जरूरत हमेशा नही पड़ती।

कुछ इस तरह के Signals भी होते हैं जो बिना तार के भेजे जा सकते हैं। इस प्रयोग को फिर College में भी किया। Radiator से 23 मीटर दूर signal भेजा।

इसके बाद तीन दीवार के पार भी Signal भेजकर दिखाया। हालांकि उस दौर में रेडियों वेव को उतना ज्यादा महत्व नही दिया गया। लेकिन आज इनका बहुत अहम स्थान है।

बोस ने नाम यह भी एक अविष्कार है लेकिन बोस ने इसका पेटेंट नही करवाया था। इस वजह से Wireless टेलीकम्यूनिकेशन का जनक मारकोनी को समझा जाता है।

लेकिन मारकोनी ने सिर्फ एक ऐसा Device बनाया था जो Radio Waves को पकड़ सकें। जबकि जगदीश चंद्र बोस ने इसके पीछे का विज्ञान खोजा था।

Wireless Transmission के जरूरी उपकरण जैसे Mercury Coherer, Radio Wave Receiver आदि जगदीश चंद्र बोस ने ही बनाये थे।

क्रेस्कोग्राफ़ (Crescograph) पेड़ो का विकास नापने के यंत्र

बोस को पेड़ों के विकास क्रम को समझना था। लेकिन इसके ऊपर स्टडी करने के लिए कोई यंत्र नही थे। इसलिये इन्होंने खुद ही Crescograph बना लिया।

इसका मुख्य काम था पेड़ों की लंबाई, चौड़ाई में कोई भी वृद्धि को बताना। यह यंत्र 1इंच के 1 लाखवें हिस्से के बराबर विकास को भी बता देता तथा।

इस यंत्र का परीक्षण सबसे पहले पत्ती और गाजर के द्वारा किया गया था। इस यंत्र का Patent अमेरिका में कराया था। इस तरह अमेरिका में Patent कराने वाले ये पहले भारतीय बने थे।

पेड़ों पर बाहरी वातावरण का प्रभाव.

बोस ही वह पहले वैज्ञानिक है जिन्होंने यह बताया कि पेड़ों के ऊपर भी बाहरी वातावरण, जैसे कि आवाज का असर पड़ता है। बोस ने 1902 में एक पेपर Responses in Living and Non Living प्रकाशित किया था जिसमे उन्होंने अपने एक प्रयोग का जिक्र करते हुए लिखा था कि ‘ पेड़ों को यदि अच्छा गाना सुनाया जाए तो उनका विकास तेज हो जाता है, जबकि भद्दा गाना या आवाज करने पर विकास धीरे हो जाता है।’

उन्होंने आगे लिखा था कि प्रदूषित हवा के कारण पेड़ भी डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं, जबकि अच्छे माहौल में वो खुश रहते हैं।कहने का मतलब यह था की पेड़ भी सुख और दुख महसूस करते हैं।

सूक्ष्म तरंगों की खोज

तरंगे कई प्रकार ही होती है। कुछ दृश्य तरंगे होगी है और कुछ अदृश्य। हम सिर्फ उन्ही लाल और नारंगी रंग के बीच की तरंग देख सकते हैं।

इसके बाद की चोटी या बड़ी तरंगे हमें दिखाई नही देती है। लेकिन J.C. Bose ने सूक्ष्म तरंगे पैदा करने की तकनीक खोज निकाली, जिसका अब बहुत ज्यादा उपयोग हो रहा है।

पौधों के विकास की गति

जगदीश चंद्र बोस ने दुनियाँ को बताया कि पौधों विकास गति कितनी होती है। उन्होंने एक बेहद ही संवेदनशील यंत्र की मदद से पौधों के विकास पर नजर रखी।

जिसके बाद वो इस निष्कर्ष पर पहुँचे की हर सेकंड पौधे के एक Inch का एक सौ हजारवाँ हिस्सा बढ़ जाता है।

पौधों में भी होती है विद्युतीय चुम्बकीय तरंग.

जगदीश चंद्र बोस का यह मानना था कि सभी सजीव और निर्जीव मे कुछ समानता होती है। कोई एक बिंदु जरूर होगा जहाँ सब जाकर मिलते होंगे। पहले यह नही माना जाता था कि पेड़ भी विद्युतीय चुम्बकीय तरंगे छोड़ते हैं।

लेकिन बोस ने इस धारणा को हमेशा के लिए बदल दिया। इसके लिए छुई-मुई और शालपर्णी पौधों का उपयोग किया।

प्रयोग के लिए इन्होंने इन पौधों में स्पंदन रिकॉर्डर लगा दिया। स्पंदन रिकॉर्डर से यह स्पष्ट हो गया कि पेड़ो से तरंगे निकलती है।

निष्कर्ष में बोस ने कहा कि जब कोई इन पत्तों को छूता है तो विद्युतीय चुम्बकीय पौधें के तने से टकराती है। टकराकर यही तरंगे इधर-उधर जाती है, जिससे कि आसपास की पत्तियां मुरझा जाती है।

सॉलिड स्टेट डायोड डिटेक्टर (Solid State Diode Detector) का अविष्कार

Solid State Diode Detector की मदद से Electromagnetic Waves को पहचाना जाता है। हालांकि आज कई तरह के डिवाइस आ गए हैं, लेकिन EM Waves को पहचानने वाला पहला उपकरण जगदीश चंद्र बोस ने बनाया था।

बोस ने इन डिवाइस को इस वजह से बनाया था क्योंकि वो पेड़ो और EM Waves के बीच सम्बंध पर खोज करना चाहते थे।

जगदीश चंद्र बोस की लिखी किताबें.

  • Motor Mechanism of Plants
  • Researches of Irritability of Plants
  • Responses in the living and Non Living
  • The Nervous Mechanism of Plants
  • Growth and Tropic Movements of Plants
  • Life Movements in Plants – 1
  • Life Movements in Plants – 2
  • Plant Responses. As a mean of physiological Investigation
  • Comparative Electro-Physiological

Jagdish Chandra Bose Achievement in Hindi

जगदीश चंद्र बोस हमारे देश के ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने पूरी दुनियाँ को बताया कि पेड़ों में भी जान है। इन्ही के खोजो के कारण आज Biophysics का अस्तित्व है और इसके बारे में पढ़ाई होती है।

  • पेड़ पौधों के जीवन मे सबसे ज्यादा प्रकाश डाला। अपने प्रयोगों के माध्यम से बताया कि पेड़ निर्जीव नही बल्कि सजीव है और इनमे भी इंसानों की तरह संवेदनाएं होती है।
  • बिना तार के Signal भेजने की खोज भी J.C. बोस ने ही की है। आज Internet, Mobile Phone और Wireless Communication सब कुछ J. C. Boss की खोज पर ही आधारित है।
  • पेड़ों पर रिसर्च करने के लिए कई तरह के device बनाते रहते थे। लेकिन उनका कभी भी Patent नही करवाते थे। Electromagnetic Waves को पहचानने वाला Device पहली बार इन्होंने ने ही बनाया था।

अध्यापन का कार्य

1885 से 1915 तक जगदीश चंद्र बोस प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रोफेसर रहे। इस दौरान इन्होंने कई अन्याय भी सहे। इस कॉलेज का नियम था कि भारतीय शिक्षकों को अंग्रेजी शिक्षकों की तुलना में ⅓ वेतन मिलता था, जो कि बोस को नमंजूर था।

इसलिए इन्होंने कहा कि मैं वेतन नही लूंगा और काम करता रहूंगा। इसी तरह 3 वर्षों तक बिना वेतन के काम करते रहे। वेतन न आने के कारण घर की काफी पुस्तैनी जमीन बेचनी पड़ी।

जगदीश चंद्र बोस इंस्टिट्यूट की स्थापना.

बोस इंस्टिट्यूट की स्थापना जगदीश चंद्र बोस 30 नवंबर 1917 को की थी। यही पर बोस अपने प्रयोग किया करते थे। इस संस्थान का एरिया एक प्रयोगशाला के हिसाब से बहुत कम था।

बोस की अधिकतर खोजें किसी आधुनिक और बहुत ज्यादा दक्ष उपकरण से नही हुए है। लेकिन आज यह
इंस्टिट्यूट देश मे रिसर्च का केंद्र बना हुआ है।

जगदीश चंद्र बोस को मिले सम्मान

विज्ञान में अपने इस अभूतपूर्व योगदान के लिए इन्हें कई बार सम्मानित किया गया है।

  • लंदन विश्वविद्यालय ने 1886 में डॉक्टरेट की उपाधि दी थी।
  • 1920 में इनको रॉयल सोसायटी का फेलो चुना गया।
  • इन्स्ट्यिूट ऑफ इलेक्ट्रिकल एण्ड इलेक्ट्रोनिक्स इंजीनियर्स की तरफ से इन्हें अपने वायरलेस हॉल ऑफ फेम मे शामिल करके सम्मानित किया गया।
  • ब्रिटिश सरकार इन्हें 1917 में नाइट बैचलर कई उपाधि दी थी।

जगदीश चंद्र बोस का निधन

माँ भारती के वीर सपूत ने 23 नवम्बर 1937 को इस धरा को अलविदा कह दिया।

उपसंहार

इन्होंने अपने जीवन मे दौरान जो काम लिए है, उससे न सिर्फ देश का गौरव बढ़ा है,बल्कि पौधों और वनस्पतियों के जीवन मे बारे में पूरी दुनियाँ की समझ बढ़ी है। विज्ञान के प्रति इनके इस अभूतपूर्व योगदान के लिए दुनियाँ इनकी ऋणी रहेगी।

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