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Essay on Caste System in India | भारत में जाति व्यवस्था पर निबंध हिंदी में

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आज सभी विद्यार्थियों के लिए हम Essay on Caste system in India लेकर आए हैं। इसमे आपको Origin of Caste System in india के अलावा काफी कुछ जानने को मिलेगा।

जाति प्रथा पर निबंध को आप 5,6,7,8,9,10,11,12 वी की परीक्षा में उपयोग कर सकते हैं।

Essay on Caste System in India – भारत में जाति व्यवस्था पर निबंध हिंदी में (250 words)

प्रस्तावना

हम सब अक्सर कई लोगों के मुंह से जाति प्रथा के बारे में कई बुराइयाँ सुनते रहते हैं लेकिन यह प्रथा आज की देन नहीं है बल्कि सदियों से चली आ रही है। और समाज सदियों से इसकी तरह तरह के दुष्परिणाम भुगतना आ रहा है।

लेकिन इसने भारतीय समाज मे इतनी गहरी जड़ बना ली है कि काफी प्रयासों के बाद भी इसे मिटाया नही जा सका है।

कोई भी व्यक्ति इस बात का सही से जवाब नहीं दे सकता कि जाति प्रथा की उत्पत्ति किस तरह हुई थी लेकिन आज यह बात तो स्पष्ट तौर पर सभी को दिखाई दे रही है कि जाति प्रथा के जितने लाभ है उससे कहीं अधिक ज्यादा नुकसान समाज इस वक्त उठा रहा है।

How Many Caste in india? – भारत मे कितनी जातियाँ है?

भारत में करीब 3000 से भी अधिक जातियां हैं सभी जातियों से जुड़े कुछ काम होते हैं। हालांकि जाति के सभी लोग अपनी जाति से जुड़ा काम नहीं करते, लेकिन फिर भी लोगों को हमेशा उनकी जाति के कामों से जोड़ करकर देखा जाता है।

भारतीय ग्रंथों में बताए गए वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत सिर्फ चार ही वर्ण बताए गए हैं और हमारे देश में पाई जाने वाली सभी जातियाँ इन्हीं चार वर्णों के अंदर ही आती है।

Origin of Caste System in india – भारत मे जाति व्यवस्था का उदय.

भारत में जाति व्यवस्था (essay on caste system in india) के उदय के संबंध में इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि भारत में आर्यों ने आक्रमण किया था और इन्होंने ही जाति व्यवस्था की शुरुआत की थी।

इनका कहना है कि आर्य मूल रूप से भारतवंशी नहीं थे। इन्होंने भारतवंशियों को उत्तर भारत में हरा दिया और अपनी सभ्यता स्थापित की, जिसका एक प्रमुख हिस्सा जाति व्यवस्था थी।

वही कुछ इतिहासकार इस परिकल्पना से सहमत नहीं है। उनका मानना है कि आर्य भारत के ही नागरिक थे, वो आक्रमणकारी नहीं थे। इनका मानना है कि वेदों में वर्ण व्यवस्था का वर्णन मिलता है। वर्तमान में जो जाति व्यवस्था देश में चल रही है इसकी उत्पत्ति वर्ण व्यवस्था से ही हुई है।

उपसंहार.

जाति व्यवस्था का दंश हमारा समाज एक लंबे काल से झेलता आ रहा है लेकिन अब इसमे बदलाव की जरूरत है।

Essay on Caste System in India – भारत में जाति व्यवस्था पर निबंध हिंदी में (500 words)

प्रस्तावना.

हमारे ग्रंथो में यह बताया गया है कि पूरा समाज चार वर्णों में बंटा हुआ है, ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इन्ही चार वर्णों के अंदर सभी जातियाँ आती है।

वर्णों के विभाजन व्यक्ति के काम के आधार पर था। यानी जो व्यक्ति जिस वर्ण से संबंधित कार्य करेगा वह उसी वर्ण का हो जाएगा लेकिन आज यह स्थिति पूरी तरह से बदल चुकी है।

आज अधिकतर जातियों के लोग अपनी जाति का काम नही करते हैं लेकिन जब बात विवाह की आती है तो अपनी जाति में ही शादी करने की बाध्यता रहती है।

इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्ण व्यवस्था आज अपनी प्रासंगिकता खो चुका है लेकिन फिर भी लोग अपने अपने फायदे के अनुसार इसका उपयोग कर रहे हैं।

Features of Caste System – जाति व्यवस्था की विशेषताएँ.

  • भारतीय समाज में कई अलग-अलग तरह की जातियां हैं। हर जाति किसी दूसरी जाति से बिल्कुल भिन्न होती है। प्रत्येक जाति से संबंधित कोई न कोई कार्य जरूर होता है। उनके खाने का तरीका, रहन-सहन और बोलचाल का तरीका दूसरी जाति से बिल्कुल भिन्न होता है। हर जाति की एक जाति पंचायत होती है जहां जाति से जुड़ी हुई सारी समस्याओं का समाधान भी किया जाता है।
  • भारतीय जाति व्यवस्था में इस बात का विशेष ख्याल रखा गया है कि हर व्यक्ति को उचित सम्मान मिले। कोई भी जाति, दूसरी जाति के काम में दखलअंदाजी ना करें इस बात का भी विशेष ध्यान रखा गया है। जाति व्यवस्था में ब्राह्मणों को सबसे ऊंची जाति का दर्जा दिया गया है जबकि शूद्र सबसे निम्न जाति में गिने जाते हैं।
  • हर जाति के लिए कुछ नियम निर्धारित किये गया है। उनका पालन कराने का कार्य पंचायत के ऊपर होता है। जाति व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति सिर्फ अपनी जाति के व्यक्ति के साथ ही शादी कर सकता है यह भी एक जाति व्यवस्था की खासियत है।
  • जाति व्यवस्था का सबसे सुंदर रूप हमें गांव की देखने को मिलता है। यहां हम देखते हैं कि हर जाति का व्यक्ति दूसरी जाति के ऊपर निर्भर है, लेकिन यह निर्भरता सिर्फ आर्थिक ना होकर सामाजिक और सांस्कृतिक भी होती है।

Due to the continuance of caste system in India – भारत मे जाति प्रथा कायम रहने के कारण.

भारतीय समाज रूढ़िवादी नहीं है। यहां जब भी कोई ऐसी प्रथा दिखाई देती है जिसका नुकसान अधिक होता है तो उसे बंद कर दिया जाता है।

लेकिन ऐसे कुछ कारण है जिसकी वजह से भारत में जाति प्रथा इतने लंबे काल से टिकी हुई है और आज भी अनवरत रूप से चल रही है।

Geographical situation in india – भारत की भौगोलिक स्थिति

भारत तीन तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है जबकि एक दिशा में विशाल हिमालय खड़ा है। ऐसे में किसी भी दूसरी जाति के लिए तक पहुंचना कभी भी आसान नहीं था।

भारतीय उपमहाद्वीप में सभी व्यक्ति एक ही विचारधारा को मानने वाले होते थे, इस वजह से कभी मतभेद होने का प्रश्न ही नहीं उठता। इस वजह से भी जाति व्यवस्था भारत में इतने लंबे काल से टिकी हुई है।

Foreigners invade India – विदेशियों का भारत पर आक्रमण

जैसे-जैसे भारत की ख्याति दूसरे देशों में फैलती गई वैसे ही विदेशी आक्रांता भारत आते गए और भारत की धन संपदा को लूटने लगे।

लेकिन भारत के लोगों में स्वाभिमान की भावना थी और इसी स्वाभिमान को तोड़ने के लिए उन्होंने भारतीय धर्म को नीचा कहा और अपने धर्म को श्रेष्ठ बताया इसी की प्रतिक्रिया स्वरूप कहीं ना कहीं भारतीयों के मन में अपनी विचारधारा के प्रति और अधिक सम्मान बढ़ने लगा जिसका हिस्सा जाति प्रथा भी थी और इसे हमेशा अपने समाज का हिस्सा बनाए रखा।

बदलाव के लिए तैयार ना होना

जाति प्रथा इतने लंबे काल से चली आ रही है इसकी एक वजह वे जातियां हैं जो इस बदलाव के लिए तैयार नहीं थी।

जाति प्रथा के कारण कुछ जातियों को नुकसान होता है वही कुछ ऐसी जातियां भी है जिनको काफी फायदा भी होता है।

जिन जातियों को इस जाति प्रथा से फायदा होता है वह कभी नहीं चाहती है कि जाति प्रथा का अंत हो। इसी वजह से उन्होंने कभी इस प्रथा को बंद करने की कोशिश भी नहीं की और यह प्रथा चली आ रही है।

सत्ता में इच्छाशक्ति का अभाव

पहले राजाओं का शासन होता था। राजाओं के शासनकाल में भी कभी इस प्रथा को बंद कराने की पूरी कोशिश नहीं की गई।

इसके बाद जब देश आजाद हुआ तो देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार सत्ता में बैठी। लेकिन सत्ता में बैठने के बाद सभी राजनीतिक दल किसी खास वर्ग और जाति के लोगों को लुभाने में जुट गए जिससे कि उनको चुनाव के दौरान वोट मिल सके।

शिक्षा का अभाव

निम्न जाति के लोग पहले शिक्षा हासिल नही कर पाते थे जिस वजह से उनके पास उचित ज्ञान नही रहता था। अपने अनुभव के आधार पर यदि वो सोचते भी की यह प्रथा खराब है तो भी उनके पास इतनी शक्ति नही होती थी कि इतने बड़े बदलाव के लिये समाज को सोचने के लिए विवश कर सकें।

उपसंहार.

जैसा कि यह स्पष्टतौर पर सभी को दिखाई दे रहा है कि आज पूरी दुनियाँ करीब आ चुकी है, ऐसे में जाति प्रथा का कोई औचित्य ही नही है।

हालांकि यह कहना कि जाति प्रथा ही गलत थी, सही नही है, क्योंकि वक़्त और समय की माँग के अनुसार काफी कुछ बदल जाता है। पुराने वक़्त में जाति प्रथा बहुत सही तरीके से काम कर रही थी जब हमारे पास इतनी सुविधाएँ नही होती थी।

लेकिन आज के वक़्त में सभी भेदभाव मिटा देना चाहिए और मानवता को सबसे ज्यादा बढ़ावा देना चाहिए क्योंकि दिलों से इंसानियत खत्म हो रही है।

Essay on Caste System in India – भारत में जाति व्यवस्था पर निबंध हिंदी में (2000 words)

प्रस्तावना

प्राचीन काल में हमारे देश में कुछ प्रथाएँ सिर्फ इस वजह से चालू हुए थी कि लोगों को अपने काम सही तरह से पता रहे और समाज में सभी चीजों का क्रियान्वयन सही तरीके से होता रहे ।

लेकिन वही प्रथा एक समय बाद पूरे समाज के लिए एक तरह से मुसीबत बन जाती हैं। एक ऐसी ही प्रथा है जाति प्रथा, जिसमें लोगों को अलग-अलग जातियों में बांटा जाता है।

जाति प्रथा वैसे तो मुख्य रूप से हिंदू समाज में देखने को मिलती है लेकिन ऐसा नहीं है कि इसका प्रभाव सिर्फ भारत में ही है।

भारत के अलावा यह व्यवस्था मिश्र और यूरोप के कई देशों में पहले से विद्यमान थी लेकिन वक्त के साथ कुछ देशों में यह प्रथा धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती गई और लोगों के बीच जातिगत भेदभाव समाप्त हो गए, लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो पाया और इसका परिणाम आज हम सब देख रहे हैं।

What is Caste? जाति क्या है?

हर व्यक्ति के नाम के पीछे एक उपनाम लगा होता है, यही व्यक्ति की जाति कहलाती है। किसी व्यक्ति की जाति यह बताती हैं कि वह व्यक्ति किस वर्ण से संबंध रखता है।

जाति व्यवस्था एक लंबे काल से सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा रही है। जाति व्यवस्था के जरिए ही लोगों को अलग-अलग वर्गों में विभाजित किया जा सकता था।

Caste System in india – भारत मे जाति व्यवस्था.

भारतीय समाज में जाति व्यवस्था कि जड़ें बहुत गहरी हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब हमारे समाज में धर्म की भी व्याख्या नहीं हुई थी उसके पहले भी जाति व्यवस्था हमारे सामाजिक तंत्र का एक अहम हिस्सा थी।

जाति व्यवस्था का सबसे पहला वर्णन हमें ऋग्वेद में मिलता है जहाँ पूरे भारतीय समाज को चार अलग-अलग वर्णों में विभाजित किया था।

  • ब्राह्मण
  • क्षत्रिय
  • वैश्य
  • शूद्र

Bramhan Caste (ब्राम्हण वर्ण)

वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण वर्ण को सभी वर्णों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस वर्ण के अंतर्गत आने वाले लोग ज्ञानोपार्जन का कार्य करते हैं।

पढ़ाई,धार्मिक क्रियाकलाप यज्ञ,हवन, समाज एवं लोगों के कल्याण के लिए विभिन्न प्रकार के धार्मिक कार्य ब्राह्मण वर्ग के लोग ही करते हैं।

वेदों में कहा गया है कि ब्राम्हण वर्ण की उत्पत्ति ब्रम्हा जी के मस्तिष्क से हुई है।

Shatriya Caste (क्षत्रिय वर्ण)

ब्राम्हण वर्ण के बाद दूसरे वर्ग के रूप में क्षत्रिय वर्ण को जाना जाता है। क्षत्रिय वर्ण को ब्रह्मा जी की भुजाओं से प्रदर्शित किया जाता है। इस वर्ण वाले के लोग समाज को सुरक्षा देने का कार्य करते हैं।

Vaishya Caste (वैश्य वर्ण)

व्यापार और धनोपार्जन से संबंधित सारे कार्य वैश्य वर्ण के लोग करते हैं। इस वर्ण के लोग समाज में प्रतिष्ठित माने जाते हैं, क्योंकि हमारे दैनिक जीवन में जिन चीजों की जरूरत पड़ती है वह सभी हमें वैश्य वर्ण के लोगों के जरिए ही मिलते हैं।

Shudra Caste (शुद्र वर्ण)

वर्ण व्यवस्था में सबसे आखिरी में शुद्र वर्ण के लोगों को गिना जाता है। शुद्र वर्ण की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के पैरों से हुई थी, ऐसा वेद में लिखा है। मेहनत-मजदूरी से संबंधित सभी कार्य जैसे साफ-सफाई आदि शुद्र वर्ण के लोग ही करते हैं।

Difference Between Varna and Caste – वर्ण और जाति में अंतर

हमारे समाज में वर्ण व्यवस्था काफी पहले से थी। इस बात के प्रमाण हमें कई ग्रंथों में लिखित रूप में मिलते हैं।

लेकिन हमें यह गलतफहमी रहती है कि वर्ण व्यवस्था ही जाति व्यवस्था है जो कि बिल्कुल भी सच नहीं है। वर्तमान में हम जिस जाति व्यवस्था को देख रहे हैं इस जाति व्यवस्था का वर्णन हमारे ग्रंथों में नहीं है।

हमारे ग्रंथों में सिर्फ वर्ण व्यवस्था का वर्णन मिलता है जबकि वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप जाति व्यवस्था है जोकि हमारे सामने है।

वर्ण व्यवस्था में पूरे समाज के लोगों को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार ही वर्णों में बांटा गया है। वर्णों के अंदर जातियाँ आती हैं।

जैसे वैश्य वर्ण के अंतर्गत गुप्ता, सोनी, अग्रवाल एवं व्यापार करने वाली हर जातियाँ आती हैं। वहीं ब्राह्मण वर्ण के अंतर्गत गर्ग, गौतम, मिश्रा, शुक्ला, पांडे आदि जातियाँ आती हैं।

क्षत्रिय वर्ण के अंतर्गत बघेल, परिहार, राजपूत आदि जातियाँ आती हैं। इसी तरह शूद्र वर्ण के अंतर्गत भी अनेक जातियाँ आती हैं।

यानी पूरे समाज को विभाजित करने के लिए सिर्फ चार ही वर्ण बनाए गए हैं और इन वर्णो के अंतर अनेक जातियाँ आती हैं।

Origin of caste system in india – भारत मे जाति व्यवस्था की शुरुआत.

भारत में आज हम जिस जाति व्यवस्था को देख रहे हैं उसकी शुरुआत किसी एक दिन नहीं हुई थी बल्कि यह धीरे-धीरे समाज में अपनी पकड़ बनाती गई और आज यह समाज के एक प्रमुख हिस्सा बन चुकी है।

वर्ण व्यवस्था का सबसे पहला वर्णन हमें ऋग्वेद में मिलता है, जिसकी उत्पत्ति काल 1508 बीसी के आसपास माना जाता है। इसी वर्ण व्यवस्था को आज हम जाति व्यवस्था भी कहते हैं लेकिन इन दोनों में बहुत ज्यादा अंतर है।

ऋग्वेद में पूरे समाज को चार अलग-अलग भागों में बांटा गया था जिसमें से ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य और शूद्र थे। लेकिन वर्णों निर्धारण कर्म के आधार पर होता था ना कि जन्म के आधार पर।

जैसे यदि किसी शुद्र वर्ण में जन्मा व्यक्ति पठन-पाठन और ज्ञान, पूजन के तरफ ज्यादा केंद्रित है तो वह ब्राह्मण वर्ण के अंतर्गत माना जाएगा।

हालांकि कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि ऋग्वेद में वर्ण व्यवस्था को काफी बाद में जोड़ा गया था।

मनुस्मृति में भी वर्ण व्यवस्था का वर्णन हमें मिलता है। इसमें भी वर्ण व्यवस्था ठीक उसी तरह से वर्णित की गई है जैसे ऋग्वेद में उसका वर्णन है।

महाभारत में भी वर्ण व्यवस्था का जिक्र मिलता है। भगवान श्री कृष्ण खुद वर्ण व्यवस्था के बारे में अर्जुन को बताते हैं और यह कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से इंसानों के कर्मों पर निर्भर करती है।

जो इंसान जैसा कर्म करेगा उसको उसी वर्ण का माना जाएगा।

पुरानी वर्ण व्यवस्था और आज की जाति व्यवस्था मैं अंतर

कई इतिहासकारों का मानना है कि भारतीय ग्रंथों में जिस वर्ण व्यवस्था के बारे में बताया गया है वह आज की जाति व्यवस्था पूरी तरह से भिन्न है।

वर्ण व्यवस्था में किसी भी वर्ण को अशुद्ध नहीं माना गया है। इसके अनुसार शुद्धि और अशुद्धि किसी व्यक्ति विशेष पर होती है ना कि इसे पूरे वर्ण पर।

जबकि आजकल हमें ऐसा देखने को मिलता है कि शुद्र वर्ण के लोगों को अछूत माना जाता है। इसके साथ ही वेदों में ऐसा कहीं भी नहीं लिखा गया है कि सिर्फ ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के लोग ही वेद और ज्ञान का अध्ययन कर सकते हैं।

ऐसा ना लिखा होने के बावजूद भी समाज में यह भ्रांति बहुत ज्यादा प्रचलित है कि वेदों ने शूद्रों को ज्ञान अर्जित करने की इजाजत नहीं दी है।

Effects of Caste system in India – जाति व्यवस्था का भारत पर प्रभाव.

भारतीय समाज का अहम हिस्सा बन चुकी जाति व्यवस्था के प्रभाव निम्नलिखित है:-

राजनीतिक स्तर पर पड़ने वाले प्रभाव.

जाति व्यवस्था का असर भारतीय राजनीति पर देखने को मिलता है। चुनाव के दौरान आमतौर पर यह देखने को मिलता है कि अधिकतर लोग अपनी जाति के उम्मीदवार को वोट देना ज्यादा पसंद करते हैं भले ही वह व्यक्ति उतना योग्य और काबिल न हो।

लेकिन फिर भी यदि वह किसी खास जाति से संबंधित है तो उस जाति के अधिकतर व्यक्ति उस व्यक्ति को ही वोट देते हैं।

भारतीय राजनीतिक पार्टियाँ इस बात को भलीभांति समझती है इसलिए क्षेत्र में जिस जाति अधिकता है वहां उसी जाति के उम्मीदवार भी चुनाव पर उतारते हैं।

जातियों का प्रभाव राजनीतिक पार्टी के ऊपर भी देखने को मिलता है। हमने कई ऐसी राजनीतिक पार्टियां देखी है जहां किसी एक जाति के अधिकतर लोग सम्मिलित होते हैं।

छुआछूत और जातिगत भेदभाव को मिलता है बढ़ावा

समाज में जाति प्रथा का सबसे बड़ा दुष्परिणाम छुआछूत और भेदभाव को मिलने वाला बढ़ावा है। ब्राह्मण और क्षत्रिय जातियों को ऊंची जाति का दर्जा दिया जाता है।

जबकि शूद्र जाति के लोगों को निम्न जाति का दर्जा दिया जाता है। निम्न जाति होने के कारण शूद्रों को कई बार अपमानजनक स्थितियाँ झेलनी पड़ती हैं।

खासकर यदि ग्रामीण इलाकों के बाद की जाए तो यहां शूद्रों की स्थिति बहुत ही ज्यादा बदतर होती है। इन्हें कुएँ से पानी नहीं निकालने दिया जाता है।

उनके रहने का ठिकाना भी कि गाँव के आखिरी कोने में होता है ऐसे अनगिनत भेदभाव इनके साथ होते हैं।

हालांकि आज कई ऐसे कानून बन चुके हैं जो शूद्रों को उनके नागरिक अधिकार देते हैं, लेकिन फिर भी शूद्रों के साथ भेदभाव आज भी कई जगहों पर देखने को मिल ही जाता है।

विवाह सिर्फ अपनी ही जाति में।

भारत में आज भी लोग अंतरजातीय विवाह को स्वीकार नहीं करते हैं। यानी विवाह होना चाहिए तो सिर्फ अपनी ही जाति में होना चाहिए। यदि कोई दूसरी जाति में विवाह कर लेता है तो उसे जाति से निकाल दिया जाता है।

हमारे देश में ऐसी कई घटनाएँ घटित होती हैं जहां पर दूसरी जाति में शादी करने पर लोगों को सजा भी दी जाती है।

ऑनर-किलिंग इसे जाति प्रथा की देन हैं। लोग अपने सम्मान और प्रतिष्ठा को ज्यादा महत्व देते हैं। पर जब परिवार का कोई सदस्य दूसरी जाति में शादी कर लेता है तो वह अपनी सम्मान और प्रतिष्ठा के खिलाफ मानते हैं और बदला लेने के उद्देश्य से उनकी हत्या करवा देते हैं।

सभी को समान अवसर ना मिला

यदि हमारे समाज में जाति प्रथा नहीं होती तो शायद हमें आरक्षण जैसी चीजें देखने को नहीं मिलती। यह जाति प्रथा की ही देन है जिसके बदौलत आज आरक्षण के कारण प्रतिभाओं के साथ भेदभाव हो रहा है।

शूद्र जाति के लोगों को हर क्षेत्र में आरक्षण मिला हुआ है, जबकि वहीं एक ब्राह्मण समाज के व्यक्ति को किसी भी क्षेत्र में आरक्षण नहीं मिला हुआ है। आरक्षण के कारण कम योग्य व्यक्ति ऊंचे पदों पर बैठ जाता है जबकि योग्य व्यक्ति नहीं पहुंच पाता है।

देश के विकास में प्रभाव

हमारा देश लोकतांत्रिक देश है यहां पर हर व्यक्ति को एक समान अधिकार मिलते हैं लेकिन जब सामाजिक व्यवस्था की गहराई में जाते हैं तो हमें दिखाई देता है कि यहां पर काफी ज्यादा भेदभाव है।

लोगों के अंदर एकता का भाव नहीं है। हर व्यक्ति अपनी ही जाति से संबंधित लोगों से जुड़ाव महसूस करता है, जबकि दूसरी जाति के व्यक्ति को वह दूसरा व्यक्ति समझता है। देश के लोगों की ऐसी मानसिकता कहीं ना कहीं हमारे देश के विकास को प्रभावित करती हैं।

आर्थिक असमानता

2001 में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसमें यह कहा गया था कि 36.3% भारतीय लोगों के पास कोई भूमि नहीं है, वही शुद्र यानी अनुसूचित जाति और अनसूचितजनजाति के लोगों के बात की जाए तो इनमें से 90% लोगों के पास खुद की भूमि नहीं है।

इनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब होती है कि यह अपनी सालाना कमाई से मात्र अपने खाने और रहने का इंतजाम कर पाते हैं। यह जाति व्यवस्था का एक सबसे बड़ा दुष्परिणाम है।

जाति व्यवस्था बनती है शोषण का कारण

निम्न वर्ग के जातियों को साथ न सिर्फ भेदभाव ही किया जाता है बल्कि इनका शोषण भी किया जाता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि ऊंची जाति के लोग हमेशा ही निम्न जाति के लोगों का शोषण करते आए हैं।

समाज में उन्हें इतनी सुविधाएं नहीं दी जाती हैं जितना दूसरी जाति के लोगों को दी जाती हैं। इसकी वजह से निम्न जाति के लोगों का समुचित विकास नहीं हो पाता और एक प्रकार से वह देश के विकास में अपना योगदान नहीं दे पाते हैं।

जाति प्रथा के द्वारा उपजी विसंगति को कैसे दूर किया जा सकता है?

ऐसा नहीं है कि जाति प्रथा का मुद्दा अभी छाया हुआ है। इस व्यवस्था के दुष्परिणाम हमें पहले भी देखने को मिले हैं। पहले भी कई ऐसे महान लोग रहे हैं जिन्होंने इस जाति व्यवस्था का खुलकर विरोध किया है और इसे बदलने के लिए भरसक प्रयास किया हैं।

समाज सुधार आंदोलन

राजा राममोहन राय, रविंद्र नाथ टैगोर, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी जैसे कई महान व्यक्तियों ने समाज सुधार के लिए कई आंदोलन किए जिनमें से एक आंदोलन छुआछूत और जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए भी रहा है।

इन सभी लोगों ने समाज को हमेशा संदेश दिया है कि किसी भी व्यक्ति के जाति उसकी पहचान नहीं होती, बल्कि उस व्यक्ति की पहचान उसके कर्म होते हैं इसलिए हमें कर्म के आधार पर किसी इंसान को महत्व देना चाहिए।

महात्मा गांधी हमेशा कहा करते थे कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता तो फिर छुआछूत और भेदभाव का प्रश्न ही नहीं उठता। इन्होंने हमेशा भाईचारे और आपसी प्रेम को बढ़ावा दिया है।

ब्रिटिश कानून ने सभी जाति को एक बनाया

जब हमारा देश गुलाम था उस दौरान ब्रिटिश कोर्ट ने जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए कई कानून बनाए जिनमें से एक कास्ट डिसेबिलिटी रिमूवल एक्ट था जो कि 1850 में बना था।

इस कानून के अलावा स्पेशल मैरिज एक्ट और हिंदू स्पेशल मैरिज एक्ट में अंतर्जातीय विवाह को भी कानूनी मान्यता दे दी। समाज में जातिगत भेदभाव को मिटाने की तरफ यह एक तरह से पहला कदम था।

देश में औद्योगिकीकरण को बढ़ावा

हमारे देश में जब से औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिलने लगा है तब से जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव कम होते गए हैं।

हमें देखते हैं कि किसी भी उद्योग में काम करने वाले लोग अलग-अलग जाति एवं धर्म को मानने वाले होते हैं। लेकिन यहाँ पर जातिगत भेदभाव नहीं दिखाई देता क्योंकि सभी व्यक्ति जानते हैं कि यहाँ काम करने वाला हर एक व्यक्ति अपनी योग्यता और डिग्री के बल पर आया है।

यदि ऐसा कुछ भेदभाव उन व्यक्तियों के साथ किया गया तो यह ना तो कंपनी के लिए अच्छा होगा और ना ही भेदभाव करने वाले व्यक्ति के लिए।

शहरीकरण से आया मानसिकता में बदलाव

गांव में अधिकतर ऐसा होता है कि एक ही जाति के लोग एक साथ ही रहते हैं। जिसकी वजह से कहीं ना कहीं अपनी जाति के प्रति प्रेमभाव और दूसरी जाति के प्रति वैमनस्य का भाव आ जाता है।

जबकि शहरों में ऐसा कुछ देखने को बहुत ही कम मिलता है। यहां पर सभी जाति के लोग एक ही जगह पर रह सकते हैं। किसी जाति के लिए कोई एक खास इलाका या मोहल्ला नहीं होता है।

इस वजह से किसी व्यक्ति को उसके काम एवं व्यवहार के आधार जाँचते हैं ना कि उसकी जाति के आधार पर।

निम्न जाति के लोगों को कानूनी अधिकार देकर

पिछले कुछ वर्षों में हमने यह देखा है कि सरकार निम्न जाति के लोगों को कई कानूनी अधिकार देती आई हैं। इसका असर अब दिखने लगा है।

आज यदि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे दूसरे व्यक्ति कर साथ जाति के आधार पर बुरा बर्ताव करता है तो वह कानूनी मदद ले सकता है।

उपसंहार

जाति व्यवस्था ने हमारे समाज को दीमक की तरह खाया है। इस व्यवस्था में काफी बुराइयाँ है जिस वजह से नया भारत इस व्यवस्था को अपने साथ लेकर आगे नही बढ़ना चाहता है।

नए भारत को ऐसे नियम चाहिए जो सभी को समान अधिकार दे, सभी के बीच समता का भाव हो और लोग एक दूसरे को उसके ज्ञान और काम ने आधार पर इज्जत दें न कि किसी जाति के आधार पर।

FAQ.

What is caste system? जाति प्रथा क्या है?

जाति प्रथा भारतीय समाज का एक लंबे वक्त से हिस्सा रही है। जाति प्रथा के जरिए लोगो को उनके काम के आधार पर बांटा जाता है।

What are the different castes under the caste system? जाति प्रथा के अंतर्गत आने वाली जातियाँ कौन कौन सी है?

पूरे समाज को चार वर्णों में बांटा गया है, इन्ही वर्णों के अंदर अलग अलग जातियाँ आती हैं। जैसे

वर्ण जातियाँ

ब्राम्हण       शुक्ल, गर्ग, गौतम, मिश्रा आदि।
क्षत्रिय        ठाकुर, परिहार, बघेल, सिंह, राजपूत आदि।
वैश्य          सोनी, अग्रवाल, गुप्ता, कुशवाहा आदि।
शुद्र            चमार, कोल, खूंटे आदि।

Discuss any one problem of the caste system? जाति प्रथा से जुड़ी कोई एक समस्या बताइए?

जाति प्रथा से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या छुआछूत है, जो शुद्र वर्ग वालों के साथ होती है।

How does caste system impact society? जाति प्रथा समाज को किस तरह प्रभावित करती है?

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ सभी को एक समान अधिकार मिलते हैं। लेकिन जाति प्रथा एक समान अधिकार देने की बात नही करता है। यहाँ एक सिस्टम है जिसमे लोगो को श्रेष्ठता के आधार पर अधिकार दिए जाते है। लेकिन यह सिस्टम भारतीय समाज के लिए घातक है, जिसे खत्म किया जाना चाहिए।

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